कभी परिवार की परिस्थितियों और सामाजिक संकोच के कारण घर से बाहर निकलना चुनौतीपूर्ण था। आज वही अर्पणा सिंह अपने आत्मविश्वास, मेहनत और लगन के बल पर सफल किराना व्यवसाय चला रही हैं और ‘लखपति दीदी’ के रूप में दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।

ग्राम गिजवार निवासी श्रीमती अर्पणा सिंह भारती स्व-सहायता समूह से जुड़ीं तो उनके जीवन में बदलाव की शुरुआत हुई। समूह से जुड़कर उन्होंने नियमित बचत करना शुरू किया और बैठकों में सहभागिता के साथ धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। परिवार का सहयोग मिला तो उन्होंने अपने सपनों को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ाया।

खास बातें

  • ग्राम गिजवार निवासी श्रीमती अर्पणा सिंह भारती स्व-सहायता समूह से जुड़ीं तो उनके जीवन में बदलाव की शुरुआत हुई।
  • अर्पणा ने स्व-सहायता समूह के माध्यम से 30 हजार रुपये का ऋण लिया और इससे किराना एवं जनरल स्टोर का व्यवसाय शुरू किया।
  • आज वे स्वयं आर्थिक रूप से सशक्त होने के साथ-साथ गांव की अन्य महिलाओं को भी स्व-सहायता समूहों से जुड़कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

अर्पणा ने स्व-सहायता समूह के माध्यम से 30 हजार रुपये का ऋण लिया और इससे किराना एवं जनरल स्टोर का व्यवसाय शुरू किया। शुरुआत छोटे स्तर से हुई, लेकिन उनकी मेहनत और व्यवहार-कुशलता से दुकान का व्यवसाय धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। उन्होंने प्राप्त ऋण को समय पर वापस किया और अपने व्यवसाय को विस्तार देने के लिए पुनः सीसी लिमिट के माध्यम से 60 हजार रुपये का ऋण प्राप्त किया।

आज अर्पणा की किराना दुकान व्यवस्थित रूप से संचालित हो रही है। व्यवसाय से होने वाली आय ने उनके परिवार को आर्थिक मजबूती दी है और उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्रदान किया है। उनकी मेहनत का परिणाम है कि वे अब लखपति दीदी की श्रेणी में शामिल हैं।

अर्पणा का कहना है कि स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें केवल आर्थिक सहयोग ही नहीं मिला, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मविश्वास भी मिला। उनका मानना है कि “यदि मन में आगे बढ़ने का संकल्प और मेहनत करने का जज्बा हो, तो परिस्थितियां कभी सफलता की राह नहीं रोक सकतीं।”

अर्पणा सिंह की कहानी इस बात की मिसाल है कि छोटे कदम भी बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकते हैं। बचत से शुरू हुआ सफर ऋण, स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता तक पहुंचा। आज वे स्वयं आर्थिक रूप से सशक्त होने के साथ-साथ गांव की अन्य महिलाओं को भी स्व-सहायता समूहों से जुड़कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

अर्पणा की कहानी संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक के उस सफर की कहानी है, जिसमें हौसले ने परिस्थितियों को बदला और मेहनत ने सपनों को नई पहचान दी।