जिले के ग्राम खाम्ह की हरिजन बस्ती में भूदृश्य पुनर्स्थापन एवं बाजार विकास प्रणाली परियोजना के अंतर्गत 10 दिवसीय बाँस मूल्य संवर्धन एवं बाँस शिल्पकार प्रशिक्षण का शुभारंभ हुआ। प्रशिक्षण का आयोजन इंस्टीट्यूट ऑफ लाइवलीहुड रिसर्च एंड ट्रेनिंग एवं आरसेटी सीधी के सहयोग से किया जा रहा है।

प्रशिक्षण के लिए प्राकृतिक इंडिया की ओर से असम से आए बाँस शिल्प विशेषज्ञ अब्दुल माजिद एवं असर अली स्थानीय कारीगरों को बाँस से आधुनिक, उपयोगी एवं बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार करने की तकनीक सिखाएंगे। प्रशिक्षण में पारंपरिक कौशल को आधुनिक डिजाइन, उत्पाद विकास और बाजारोन्मुख तकनीकों से जोड़ने पर विशेष जोर दिया जाएगा।

खास बातें

  • प्रशिक्षण में पारंपरिक कौशल को आधुनिक डिजाइन, उत्पाद विकास और बाजारोन्मुख तकनीकों से जोड़ने पर विशेष जोर दिया जाएगा।
  • कार्यक्रम का शुभारंभ वार्ड पंच राजकुमारी बंसल एवं उदैसा के रूपा उत्पादक समूह की अध्यक्ष रामकली सिंह ने औजारों की पूजा के साथ किया।
  • प्रशिक्षक अब्दुल माजिद ने बाँस से तैयार किए जा सकने वाले विभिन्न आधुनिक उत्पादों, डिजाइन की संभावनाओं और उनके व्यावसायिक महत्व की जानकारी दी।

कार्यक्रम का शुभारंभ वार्ड पंच राजकुमारी बंसल एवं उदैसा के रूपा उत्पादक समूह की अध्यक्ष रामकली सिंह ने औजारों की पूजा के साथ किया। प्रशिक्षक अब्दुल माजिद ने बाँस से तैयार किए जा सकने वाले विभिन्न आधुनिक उत्पादों, डिजाइन की संभावनाओं और उनके व्यावसायिक महत्व की जानकारी दी।

आरसेटी की फैकल्टी रेनू सिंह ने प्रशिक्षण के बाद स्वरोजगार शुरू करने वाले पात्र प्रतिभागियों को कार्यशील पूंजी के लिए बैंक ऋण से जोड़ने में आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल शिल्प कौशल विकसित करना नहीं, बल्कि कारीगरों को अपने हुनर को व्यवसाय में बदलने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग उपलब्ध कराना भी है।

परियोजना प्रबंधक हिमांशु भारद्वाज ने परियोजना के अंतर्गत अब तक किए गए कार्यों एवं उपलब्धियों की जानकारी दी। उन्होंने प्रशिक्षण के बाद कारीगरों के लिए उपलब्ध आजीविका एवं उद्यमिता के अवसरों, आर्टिजन कार्ड, उत्पाद मूल्य संवर्धन तथा मार्केटिंग से जुड़ी संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।

प्रशिक्षण के माध्यम से स्थानीय कारीगरों के पारंपरिक बाँस शिल्प को आधुनिक डिजाइन, उद्यमिता और बाजार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर उत्पादों की विविधता बढ़ने के साथ कारीगरों के लिए आय के नए स्रोत एवं स्थायी आजीविका के अवसर मिलेंगे।