जिस चने को किसान खेत में उगाकर बेच देता था, उसी चने को रोहित कुमार मिश्रा ने अपनी उद्यमशीलता से बेसन में बदलकर आय का नया जरिया बना लिया। सीधी जिले के मड़वास के रोहित ने कृषि उपज में छिपी संभावनाओं को पहचाना और खेती को केवल उत्पादन तक सीमित न रखते हुए उसे खाद्य प्रसंस्करण से जोड़ा। मई 2025 में शुरू हुई उनकी यह छोटी-सी पहल आज एक ऐसे उद्यम का रूप ले चुकी है, जिससे उन्हें स्वयं आय मिल रही है और दूसरे लोगों को भी रोजगार का अवसर मिला है।
रोहित ने शुरुआत करीब 3 लाख रुपये की लागत से 45 क्विंटल चना खरीदकर की। चने के प्रसंस्करण से तैयार बेसन को सीधी और सिंगरौली के बाजारों में 100 से 170 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जाने लगा। प्रसंस्करण के दौरान निकलने वाले करीब 25 प्रतिशत चने के छिलके का भी उपयोग किया गया, जिसे 3 से 5 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचकर अतिरिक्त आय प्राप्त की जा रही है।
इस उद्यम को स्थापित करने में उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग का सहयोग महत्वपूर्ण रहा। प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना (PMFME) के अंतर्गत रोहित को 3.50 लाख रुपये का अनुदान प्राप्त हुआ। इस सहायता ने उन्हें बेसन प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने और उसे बाजार से जोड़ने में मदद की।
आज रोहित को बेसन प्रसंस्करण से लगभग 1 लाख से 1.50 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ प्राप्त होने लगा है। उनकी इकाई अब उनकी अपनी आय बढ़ाने के साथ अन्य लोगों के लिए भी रोजगार का माध्यम बन रही है।
रोहित कहते हैं, “बेसन मिल शुरू करने से मुझे आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला। आज मैं स्वयं के साथ अन्य लोगों को भी रोजगार दे पा रहा हूं। व्यवसाय शुरू करने में विभाग से मिले सहयोग ने मुझे आगे बढ़ने में काफी मदद की।”
रोहित का मानना है कि किसान यदि अपनी उपज का प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन करें, तो खेती से होने वाली आय को नए स्तर तक ले जाया जा सकता है। वे अन्य किसानों को भी कृषि आधारित छोटे उद्योगों से जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं।
रोहित की कहानी बताती है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़ी शुरुआत जरूरी नहीं होती। सही सोच, अवसर और सहयोग मिले तो खेत में पैदा होने वाला एक साधारण चना भी उद्यमिता, रोजगार और आत्मनिर्भरता की कहानी लिख सकता है।

