कभी खेती के लिए जरूरी जैविक संसाधनों के लिए किसानों को गांव से बाहर जाना पड़ता था, तो आज वही संसाधन गांव में ही उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी समूह की दीदियां संभाल रही हैं। आजीविका मिशन के एकीकृत कृषि क्लस्टर (IFC) के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं का नेतृत्व अब खेती में नए बदलाव की आधारशिला बन रहा है। दीदियां जैविक कृषि सामग्री तैयार करने, किसानों तक पहुंचाने और प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ स्वयं एक नई आजीविका गतिविधि से भी जुड़ रही हैं।

विकासखण्ड सीधी में किसानों और ग्रामीण परिवारों को कृषि आधारित आजीविका से जोड़ने के उद्देश्य से तीन से चार ग्रामों को मिलाकर चार एकीकृत कृषि क्लस्टर (Integrated Farming Cluster-IFC) विकसित किए गए हैं। प्रत्येक क्लस्टर में जैविक संसाधन केंद्र (Bio Resource Centre-BRC) स्थापित किया गया है। इन्हीं में से एक है बढ़ौरा का बीआरसी, जिसकी शुरुआत अप्रैल 2025 में हुई।

खास बातें

  • इन्हीं में से एक है बढ़ौरा का बीआरसी, जिसकी शुरुआत अप्रैल 2025 में हुई।
  • जैविक कृषि सामग्री की तैयारी से लेकर उसके रख-रखाव और बिक्री तक, किसानों से संपर्क से लेकर बीआरसी के प्रचार-प्रसार तक दीदियां सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
  • बढ़ौरा बीआरसी के माध्यम से किसानों को बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, वर्मी कम्पोस्ट, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र सहित विभिन्न जैविक कृषि सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है।

इस क्लस्टर में बढ़ौरा, कुबरी और बरीगवां-2 ग्राम शामिल हैं और कुल 254 परिवार आईएफसी से जुड़े हैं। इनमें कुछ परिवार अपनी भूमि पर खेती करते हैं, जबकि कुछ बटाई की भूमि पर कृषि कार्य कर आजीविका चला रहे हैं। आईएफसी के माध्यम से इन परिवारों को कृषि उत्पादन के साथ प्राकृतिक खेती, जैविक संसाधनों और आय बढ़ाने वाली गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

दीदियों के हाथों में बीआरसी की कमान

बढ़ौरा बीआरसी की सबसे बड़ी ताकत यहां की समूह दीदियां हैं। उजाला सीएलएफ, टिकटकला के माध्यम से चांदनी रावत, सुमित्रा रावत, गुड़िया यादव सहित अन्य दीदियां बीआरसी के संचालन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।

जैविक कृषि सामग्री की तैयारी से लेकर उसके रख-रखाव और बिक्री तक, किसानों से संपर्क से लेकर बीआरसी के प्रचार-प्रसार तक दीदियां सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। आजीविका मिशन से मिलने वाले तकनीकी मार्गदर्शन ने उनके काम को और व्यवस्थित किया है। इससे वे केवल योजना की लाभार्थी नहीं, बल्कि कृषि बदलाव की सहभागी और स्थानीय स्तर पर संसाधन उपलब्ध कराने वाली उद्यमी के रूप में आगे बढ़ रही हैं।

गांव में ही मिल रहे खेती के जैविक संसाधन

बढ़ौरा बीआरसी के माध्यम से किसानों को बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, वर्मी कम्पोस्ट, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र सहित विभिन्न जैविक कृषि सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। स्थानीय स्तर पर इन संसाधनों की उपलब्धता से किसानों को जरूरी सामग्री आसानी से मिल रही है और प्राकृतिक खेती के लिए गांव में उपलब्ध संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है। बीआरसी की पहल का उद्देश्य केवल सामग्री उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि किसानों को उसके उपयोग की जानकारी देकर प्राकृतिक और रसायन मुक्त खेती की ओर प्रेरित करना भी है।

‘एक बगिया मां के नाम’ से जुड़ी नई पहचान

बीआरसी में तैयार जैविक कृषि सामग्री को ‘एक बगिया मां के नाम’ योजना के तहत लगाए गए पौधों में उपयोग कर स्थानीय स्तर पर इसकी उपयोगिता और पहचान को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे ग्रामीण परिवारों को पौधों की देखभाल और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जोड़ने के साथ जैविक एवं प्राकृतिक खेती के प्रति रुचि विकसित करने का अवसर मिल रहा है।

सीआरपी किसानों और बीआरसी के बीच मजबूत कड़ी

इस पूरी पहल को किसानों तक पहुंचाने में सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (CRPs) की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सीआरपी गांव-गांव जाकर किसानों से संपर्क करते हैं, बीआरसी में उपलब्ध सामग्री की जानकारी देते हैं और उसके उपयोग के बारे में समझाते हैं। इससे किसानों और बीआरसी के बीच निरंतर संपर्क बना है और प्राकृतिक खेती से जुड़ी जानकारी अधिक परिवारों तक पहुंच रही है।

स्टॉल से गांव की पहल को मिल रही पहचान

विभिन्न कार्यक्रमों और आयोजनों में बीआरसी के स्टॉल लगाए जा रहे हैं। यहां जैविक कृषि सामग्री के साथ उसके उपयोग और प्राकृतिक खेती की जानकारी भी प्रदर्शित की जाती है। इन आयोजनों के माध्यम से किसानों, ग्रामीणों और अन्य लोगों को समूह की दीदियों की पहल से परिचित होने का अवसर मिल रहा है।

बढ़ौरा का जैविक संसाधन केंद्र अब केवल कृषि सामग्री उपलब्ध कराने का केंद्र नहीं है। यह ग्रामीण महिलाओं के नेतृत्व, स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग और किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने की एक ऐसी पहल बन रहा है, जहां बदलाव की कमान गांव की दीदियों के हाथों में है। खेतों में नई सोच के साथ उतरती ये दीदियां न केवल खेती की तस्वीर बदल रही हैं, बल्कि ग्रामीण आजीविका में महिला नेतृत्व की नई कहानी भी लिख रही हैं।