कहते हैं कि जब इंसान कुछ कर गुजरने की ठान लेता है तो परिस्थितियां भी उसके रास्ते में ज्यादा देर तक बाधा नहीं बन सकतीं। मेहनत, आत्मविश्वास और सही अवसर मिले तो सीमित संसाधनों में भी सफलता की नई कहानी लिखी जा सकती है। ऐसी ही प्रेरणादायी कहानी है सीधी जिले के वनांचल विकासखंड कुसमी के दूरस्थ ग्राम मेडरा की रहने वाली मनीषा पनिका की।

एक समय मनीषा के सामने आर्थिक कठिनाइयां थीं। परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए संसाधन सीमित थे और आगे बढ़ने का कोई स्पष्ट रास्ता नजर नहीं आ रहा था। इसी दौरान उन्हें स्वयं सहायता समूह की जानकारी मिली। मनीषा ने अवसर को पहचाना और गांव की 12 महिलाओं को जोड़कर ‘खुशी स्वयं सहायता समूह’ का गठन किया।

खास बातें

  • मनीषा ने अवसर को पहचाना और गांव की 12 महिलाओं को जोड़कर ‘खुशी स्वयं सहायता समूह’ का गठन किया।
  • समूह की नियमित बैठकें होने लगीं और महिलाओं ने बचत की शुरुआत की।
  • समूह को आर एफ की राशि प्राप्त होने के बाद मनीषा ने समूह से 10 हजार रुपये का ऋण लिया।

समूह की नियमित बैठकें होने लगीं और महिलाओं ने बचत की शुरुआत की। समूह को आर एफ की राशि प्राप्त होने के बाद मनीषा ने समूह से 10 हजार रुपये का ऋण लिया। इस छोटी सी आर्थिक सहायता ने उनके भीतर आत्मविश्वास जगाया और आगे बढ़ने का हौसला दिया।

लगभग छह माह बाद समूह को यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, कुसमी शाखा से सामुदायिक ऋण सीमा प्राप्त हुई। मनीषा ने इस राशि में से एक लाख रुपये का ऋण लेकर दुकान शुरू की। शुरुआत छोटी थी, लेकिन मेहनत और लगन से दुकान का कारोबार धीरे-धीरे बढ़ने लगा। नियमित मेहनत ने मनीषा को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया और वे अपने पैरों पर खड़ी होने लगीं।

व्यवसाय को और विस्तार देने के लिए मनीषा ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया से मुद्रा ऋण के रूप में दो लाख रुपये का ऋण लिया। अतिरिक्त पूंजी मिलने से उन्होंने दुकान में विभिन्न आवश्यक वस्तुओं का भंडार बढ़ाया। आज उनकी दुकान में लगभग चार लाख रुपये का सामान उपलब्ध है और उनका व्यवसाय निरंतर आगे बढ़ रहा है।

मनीषा की यह यात्रा केवल आर्थिक बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि स्वयं सहायता समूह महिलाओं को बचत और ऋण की सुविधा देने के साथ उनके भीतर आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की भावना भी विकसित कर सकते हैं।

आज मनीषा अपने गांव के साथ-साथ आसपास के लोगों के लिए भी प्रेरणा बनी हुई हैं। कभी आर्थिक कठिनाइयों के बीच रास्ता तलाश रहीं मनीषा ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर न केवल अपने लिए रोजगार का साधन तैयार किया, बल्कि यह साबित किया कि अवसर मिले और उसे मेहनत के साथ अपनाया जाए तो छोटे कदम भी बड़ी सफलता की ओर ले जा सकते हैं।